June 13, 2021

नेहरु आर्ट गैलरी में सैयद हैदर रजा की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी उद्घाटित

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भिलाई. भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसम्पर्क विभाग द्वारा संचालित नेहरु आर्ट गैलरी में 26 फरवरी, 2020 को संध्या 6.30 बजे श्री सैयद हैदर रजा द्वारा निर्मित पेंटिंग्स की एकल प्रदर्शनी का उद्घाटन संयंत्र के मुख्य महाप्रबंधक (उपयोगिताएँ) श्री ए के मंडल ने बतौर मुख्य अतिथि किया। इस अवसर पर कवि और कला समीक्षक श्री उदयन वाजपेयी विशेष रूप से उपस्थित थे।
इस अवसर भिलाई इस्पात संयंत्र के वरिष्ठ अधिकारी गण और भारी संख्या मे इस्पात नगरी के कलाकार, कलाप्रेमी नागरिक और इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उपस्थित थे।
विदित हो कि सैयद हैदर रजा उर्फ एस.एच. रजा (जन्म 22 फरवरी 1922) एक प्रतिष्ठित भारतीय कलाकार हैं जो 1950 के बाद से फ्रांस में रहते और काम करते हैं, लेकिन भारत के साथ उनके तार मजबूती से जुड़े हुए रहे। उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल या एक्रेलिक में बने परिदृश्य हैं जिनमे रंगों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, व जो भारतीय ब्रह्माण्ड विज्ञान के साथ-साथ इसके दर्शन के चिह्नों से भी परिपूर्ण हैं। वर्ष 1981 में उन्हें पद्म श्री और ललित कला अकादमी की मानद सदस्यता, वर्ष 2007 में पद्म भूषण तथा वर्ष 2013 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा – सैयद हैदर रजा का जन्म मध्य प्रदेश के मंडला जिले में, जिले के उप वन अधिकारी सैयद मोहम्मद रजी और ताहिरा बेगम के घर हुआ था, तथा यही वह जगह थी जहां उन्होनें अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष गुजारे व 12 वर्ष की आयु में चित्रकला सीखी, जिसके बाद 13 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश के ही दमोह चले गए, जहां उन्होनें राजकीय उच्च विद्यालय, दमोह से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। हाई स्कूल के बाद, उन्होनें नागपुर में नागपुर कला विद्यालय (1939-43), तथा उसके बाद सर जे.जे. कला विद्यालय, बम्बई (1943-47) से अपनी आगे की शिक्षा ग्रहण की, जिसके बाद 1950-1953 की बीच फ्रांस सरकार से छात्रवृति प्राप्त करने के बाद अक्टूबर 1950 में पेरिस के इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स से शिक्षा ग्रहण करने के लिए फ्रांस चले गए। पढ़ाई के बाद उन्होनें यूरोप भर में यात्रा की और पेरिस में रहना तथा अपने काम का प्रदर्शन जारी रखा। बाद में 1956 के दौरान उन्हें पेरिस में प्रिक्स डे ला क्रिटिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे प्राप्त करने वाले वह पहले गैर-फ्रांसिसी कलाकार बने।

प्रारंभिक कैरियर – सैयद हैदर रजा की पहली एकल प्रदर्शनी 1946 में बॉम्बे आर्ट सोसाइटी सैलून में प्रदर्शित हुई थी और उन्हें सोसाइटी के रजत पदक से सम्मानित किया गया था। उनके चित्र अभिव्यक्ति के चित्रण से लेकर परिदृश्य चित्रकला तक विकसित हैं। 1940 के शुरुआती दशक में अपने परिदृश्यों तथा शहर के चित्रणों के धाराप्रवाह पानी के रंगों से गुजरते हुए उनका झुकाव चित्रकला की अधिक अर्थपूर्ण भाषा, मस्तिष्क के चित्रण की ओर हो गया।

वर्ष 1947 उनके लिए एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ, क्योंकि यही वो वर्ष था जब उन्होनें के.एच. आरा तथा ऍफ.एन. सूजा (फ्रांसिस न्यूटन सूजा) के साथ क्रांतिकारी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की सह-स्थापना की, जिसने भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के प्रभावों से मुक्ति दी तथा कला में भारतीय अंतर दृष्टि का समावेश किया। समूह की पहली प्रदर्शनी 1948 में आयोजित हुई। फ्रांस में अभिव्यक्ति के चित्रण से निकल कर वृहद् परिदृश्यों के चित्रण तथा अंततः इसमें भारतीय हस्तलिपियों के तांत्रिक तत्वों को शामिल करके उन्होनें पश्चिमी आधुनिकता की धारा के साथ प्रयोग जारी रखा। वर्ष 1962 में वे बर्कले, अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अंशकालिक व्याख्याता बन गए। शुरू में रजा को फ्रांस के ग्रामीण इलाकों के ग्राम्य जीवन ने आकृष्ट किया। रजा सांकेतिक ब्रश स्ट्रोकों तथा पेंट के भारी भरकम प्रयोग द्वारा इम्पेस्टो तकनीक, शैलीगत उपकरणों का प्रयोग करते रहे जो उनके बाद के 1970 के दशक के परिदृश्यों में दिखाई देते हैं।

भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसंपर्क विभाग द्वारा संचालित नेहरु आर्ट गैलरी में यह प्रदर्शनी 26 से 28 फरवरी तक प्रतिदिन संध्या 5.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक आम नागरिकों के अवलोकनार्थ खुली रहेगी।