May 13, 2021

ममता तीसरी बार सत्ता में, पर भाजपा जैसा मजबूत विपक्ष पहली बार; ऐसे में न तकरार थमती दिख रही, न सियासी हिंसा

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बंगाल : चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘दो मई, दीदी गईं’, लेकिन हो गया इसका उल्टा। दीदी एक बार फिर भारी बहुमत के साथ बंगाल की सत्ता में आ चुकी हैं। दीदी की जीत प्रचंड है, लेकिन यह चुनाव कुछ मायनों में अलग है। 2011 और 2016 में जीत हासिल करने के बाद उन्हें लेफ्ट-कांग्रेस का जो विपक्ष मिला, वह बहुत कमजोर था और ममता को कभी भी विपक्ष की ओर से चुनौती नहीं मिली, लेकिन इस बार उनके सामने विपक्ष के तौर पर भाजपा है और केंद्र में उसकी सत्ता भी है।

ऐसे में बंगाल की राजनीति की हलचलें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनती रहेंगी। बंगाल के कई शहरों में भाजपा दफ्तरों पर हमलों की खबरें भी बताती हैं कि राज्य में सियासी हिंसा का दौर आसानी से थमने वाला नहीं है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने दावा किया है कि चुनाव के बाद शुरू हुई हिंसा में 24 घंटे में 9 लोगों की मौत हुई है। प्रदेश में डर का माहौल है। सत्ताधारी पार्टी हाथ बांध कर बैठी है। पुलिस कोई मदद नहीं कर रही है। हमने इस मसले पर राज्यपाल से मुलाकात की है। उन्होंने कार्रवाई का भरोसा दिया है।

फिलहाल थमता नहीं दिखता भाजपा तृणमूल का टकराव
बंगाल के चुनाव में भाजपा की मुख्य रणनीति ध्रुवीकरण थी। चुनाव के दौरान भी भाजपा जय श्रीराम के नारे और मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों के सहारे चुनाव का एजेंडा सेट करने की कोशिश करती रही। चुनाव में इस रणनीति को भले ही सीटों में नहीं बदला जा सका, लेकिन भाजपा की ओर से साफ संकेत मिल रहे हैं कि वह अपने इस एजेंड को जारी रखेगी। यानी भारी बहुमत के बाद भी ममता की प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां कम नहीं होती नजर आ रहीं।

ममता भी इस बात को समझ रही हैं कि ध्रुवीकरण की राजनीति भाजपा जारी रखेगी। अपने ऊपर लगाए गए मुस्लिम तुष्टिकरण के ठप्पे से उबरने के लिए उन्होंने चुनाव के दौरान चंडी पाठ किया था। तो चुनाव में प्रचंड जीत के तुरंत बाद ही ममता बनर्जी कालीघाट मंदिर दर्शन करने पहुंचीं। मंदिर दर्शन का प्रतीकात्मक संदेश यही है कि ममता आगे भी भाजपा के पोलराइज करने वाले मुद्दों के प्रति कुछ ऐसा ही रुख रखेंगी, लेकिन यह कैसे होगा और इसके साथ अल्पसंख्यक समुदाय को भी कैसे साधा जाएगा यह चुनौतीपूर्ण बात होगी।

ममता-मोदी की तकरार पुरानी
किसानों को केंद्र की PMसम्मान निधि देने की बात हो या फिर राज्य की जनता को आयुष्मान योजना का लाभ देने की बात हो। दीदी ने पिछले शासनकाल में इसे लागू नहीं होने दिया। ममता बनर्जी ने राज्य में पहले से चल रही ‘कृषक बंधु योजना’ और ‘स्वास्थ्य साथी योजना’ का हवाला देकर इसे राज्य में आने से रोक दिया।

2019 में ओडिशा और पश्चिम बंगाल में आए भीषण चक्रवात के दौरान भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तकरार सामने आई थी। तब नरेंद्र मोदी ने ओडिशा के हालात का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मीटिंग की, लेकिन उन्होंने ममता बनर्जी से मीटिंग नहीं की। बाद में इसका स्पष्टीकरण भी PMO से आया। प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना था कि ममता बनर्जी को दो बार फोन किया गया, लेकिन ममता बनर्जी ने कॉल रिसीव नहीं किया। बाद में ममता ने मीटिंग में शामिल होने से मना कर दिया।

अभी कोविड के दौरान हुई हालिया तीन मीटिंग, 24 नवंबर, 8 अप्रैल, 21 अप्रैल को हुई कोरोना बैठक में ममता बनर्जी ने हिस्सा नहीं लिया। हालांकि 21 अप्रैल की मीटिंग को लेकर ममता बनर्जी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उन्हें बैठक में नहीं बुलाया गया। उधर, जेपी नड्डा ने 25 अप्रैल को एक वर्चुअल रैली में कहा, ‘दीदी ने कोविड के लिए तैयारियों का जायजा लेने और उससे निपटने के रास्ते तलाशने वाली PM की वर्चुअल मीटिंग में आखिर हिस्सा क्यों नहीं लिया।’

TMC से भाजपा में आए दिनेश त्रिवेदी कहते हैं, राज्य में भाजपा मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी है। लिहाजा राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार में लगाम लगाने में भाजपा मजबूत विपक्ष का काम करेगी।’ दिनेश त्रिवेदी ने दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में राज्य की तृणमूल कांग्रेस में तोलेबाजी और कट मनी का आरोप लगाते हुए कहा था, ‘CPM के समय तो यह था कि एक आदमी को या पार्टी को पैसा दो तो वहीं सब रफा-दफा हो जाता था। लेकिन अब तो भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि एक को पैसा दो तो चार और गुंडे खड़े हो जाते हैं।’

दिनेश त्रिवेदी की बातें इशारा कर रही हैं कि चुनाव हारने के बाद भी भाजपा अपने इस अभियान को तेज रखेगी और तृणमूल के साथ उसका टकराव जारी रहेगा। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि यह टकराव कभी-कभी राजनीतिक हिंसा में भी बदलेगा।

TMC प्रवक्ता जायसवाल कहते हैं, ‘चुनाव खत्म हुए, अब कोविड के खिलाफ जंग शुरू होगी। इसके लिए राज्य को एकमुश्त रकम की जरूरत होगी, लिहाजा हम केंद्र के पास GST और कई अन्य टैक्स के जरिए इकट्ठा हुई तकरीबन 90 हजार करोड़ की रकम मांगेंगे ताकि बंगाल में कोविड से लड़ने के लिए मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत किया जा सके।’ यह रकम भी केंद्र और राज्य के बीच विवाद का कारण बनेगी। जानकार ऐसा ही मानते हैं। हालांकि ममता की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से किए गए ट्वीट में राज्य को कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हर मदद देने का वादा किया गया है।

ममता के सामने एकजुट विपक्ष पहली बार
इससे पहले ममता बनर्जी ने 2016 में 211 सीटें जीती थीं, लेकिन सामने CPM और कांग्रेस को 26 और 44 सीटें मिली थीं। लेफ्ट और कांग्रेस ने भले ही साथ मिलकर करीब 70 सीटें हासिल कर ली थीं, लेकिन राज्य में ममता को शासन में कभी कोई दिक्कत नहीं आई। लेफ्ट तो धीरे-धीरे साफ ही हो रहा था, कांग्रेस भी ममता के काम के आड़े नहीं आती थी। 2011 में तो ममता लेफ्ट के 34 साल के शासन को चुनौती देकर आईं थीं। उस समय हालांकि इनके पास 184 सीटें थीं, लेकिन तब उन्होंने राज्य में कांग्रेस के साथ UPA गठबंधन में चुनाव लड़ा था। केंद्र में भी तृणमूल और कांग्रेस साथ थे। कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं। 294 सीटों की विधानसभा में 226 सीटों के साथ ममता की अगुवाई वाला UPA गठबंधन बहुत मजबूत था। सामने लेफ्ट फ्रंट के पास महज 40 सीटें थीं, लेकिन इस बार 76 सीटें जीतने वाली भाजपा ममता के सामने है। सीटों के लिहाज से भाजपा बड़ा विपक्ष न लगे, लेकिन भाजपा की सक्रियता और केंद्र में उसकी सरकार के कारण वह एक कड़ा विपक्ष साबित होने वाली है।

ममता एक बार हिंदी में दहाड़ीं और मोदी बांग्ला में गरजे
2019 के चुनावों के पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली के जंतर-मंतर में कई राज्यों को मुख्यमंत्रियों के साथ एक सभा की थी। इस सभा में ममता ने मोदी पर जमकर निशाना साधा था। यहां से यह कयास लगाए जा रहे थे कि अब ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में उतरेंगी। मजेदार बात यह है कि ममता बनर्जी ने मंच से हिंदी में भाषण दिया था, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 मार्च को पहली बार बांग्ला में मंच से गरजे। इसके बाद तो कई रैलियों में मोदी बांग्ला बोलते हुए नजर आए। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी सधी हुई बांग्ला भाषा में भाषण देते हुए सबको चकित कर दिया। नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया अकाउंट से भी बांग्ला में खूब पोस्ट हुईं। चुनाव के बाद भी यह सिलसिला जारी है। यानी कमल और तृणमूल के बीच की राजनीतिक जंग चुनाव के बाद भी जारी रहेगी।

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